मूकएक्सप्रेस24 रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार के जनसंपर्क विभाग (DPR) के खर्चों को लेकर सूचना का अधिकार (RTI) के तहत सामने आई जानकारी ने प्रशासनिक और पत्रकारिता जगत में हलचल मचा दी है। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, विभाग ने 01 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2024 के बीच Event Craft Entertainment नामक एक निजी कंपनी को कुल 12 करोड़ 61 लाख रुपये का भुगतान किया है।
यह राशि औसतन हर महीने एक करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। इतने बड़े भुगतान को लेकर अब यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इस निजी कंपनी द्वारा ऐसा कौन-सा कार्य किया गया, जिसके लिए सरकारी खजाने से इतनी भारी रकम खर्च की गई।
काम क्या हुआ, लाभ किसे मिला?
आरटीआई में बताया गया है कि यह भुगतान विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों, आयोजनों और “इंटरटेनमेंट एक्टिविटीज” के नाम पर किया गया। लेकिन जानकारों का कहना है कि इन आयोजनों से आम जनता को कोई प्रत्यक्ष या ठोस लाभ नजर नहीं आता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सार्वजनिक धन से करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, तो:
कार्यों का स्पष्ट विवरण
खर्च की गुणवत्ता
कार्यक्रमों का सामाजिक प्रभाव
इन सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
स्थानीय पत्रकारों की अनदेखी के आरोप
इस पूरे मामले में एक गंभीर सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि प्रदेश के स्थानीय, जिला और मझोले स्तर के पत्रकारों व डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि बाहरी निजी कंपनियों को करोड़ों रुपये के विज्ञापन और इवेंट कार्य सौंपे जा रहे हैं।
कई पत्रकार संगठनों का आरोप है कि जनसंपर्क विभाग की नीतियां अब स्थानीय मीडिया के बजाय बाहरी एजेंसियों के पक्ष में झुकी हुई नजर आ रही हैं।
पत्रकारों में रोष, पक्षपात के आरोप
आरटीआई से आंकड़े सामने आने के बाद प्रदेश के पत्रकारों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। आरोप है कि वर्तमान व्यवस्था में:
स्थानीय पत्रकारों से संवाद लगभग समाप्त हो गया है
विज्ञापन वितरण में पारदर्शिता नहीं है
कुछ चुनिंदा कंपनियों को लगातार लाभ पहुंचाया जा रहा है
पत्रकारों का कहना है कि जब एक ही कंपनी को सालभर में 12 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया जा सकता है, तो प्रदेश के सैकड़ों पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को क्यों उपेक्षित किया जा रहा है।
संरक्षण और कमीशन की चर्चाएं
सूत्रों के अनुसार, संबंधित निजी कंपनी को एक प्रभावशाली आईएएस अधिकारी का संरक्षण प्राप्त होने की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। हालांकि, इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके साथ ही, विज्ञापन और इवेंट कार्यों में कमीशनखोरी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शासन-प्रशासन की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करेगा।
निष्पक्ष जांच की मांग
मीडिया और प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे प्रकरण में निम्न बिंदुओं पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है—
निविदा (टेंडर) प्रक्रिया
भुगतान के नियम और मानक
किए गए कार्यों का वास्तविक मूल्यांकन
स्थानीय मीडिया की उपेक्षा के कारण
अब देखना यह होगा कि सरकार इस खुलासे को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या इस मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।
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BAHUT BEST
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